Thursday, 17 October 2024

"हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर शहर" (हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर शहर, हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर रजाई) १. हमर नगर म मया रे बसे, सुग्घर माटी, अपन सब सँझे, कांसा, धान के पंखा फहरय, झूमे बगिया, चिरई चहकय। (हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर शहर, हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर रजाई) २. बगड़ के पांख म संझा सुते, दूध दारू के गंध सुंघाय, आमा तरिया म जुरमिल रहिबो, संगवारी मया ह बगराय। (हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर शहर, हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर रजाई) ३. आकाश रंग ह नीला दिखय, बइरी झुलझुल ह हवा चलाय, सोनहा बोली, सुग्घर मया रे, हमर छत्तीसगढिया दिल बसाय। (हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर शहर, हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर रजाई) ४. रात के चंदा ह मुसकाय, सुपा सुगंध ले महकाय, कहिथे सगरो, ऐ मया के ठिकाना, इहां के माटी, हमर अभिमान। (हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर शहर, हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर रजाई) हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर शहर, हुं हुं हुं हुं, हमर सुंघर रजाई।

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